Tuesday, 13 April 2021

ख़्वाब

 हैं अधूरे ख़्वाब जो, सोने न देते मुझे

न मुकम्मल ख़्वाब जो, जीने न देते मुझे

उलझने हैं ज़िन्दगी की, इनको बस तू थाम ले

शोर है खामोशियों का, धड़कनों से जान ले

लब पे है ठहरी हंसी जो, अब इसको तू पहचान ले

जुगनुओं सी चमकी आँखे, किरची हुए जो ख़्वाब हैं।

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Thursday, 23 July 2020

न मुकम्मल....

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कुछ अधूरी सी शाम....
कुछ अधूरी सी रातें.....
मुकम्मल तो वो सुबह भी न थी....
जब तुम कुछ न बोले।
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Tuesday, 5 May 2020

            




           खामोशियों से डर लगता है मुझे....

           अब मैं खुद से ही बातें कर लेती हूँ।

Saturday, 11 May 2019

                        मैं
एक दिन मैंने अपनी दिशा बदल ली,
    मेरी नज़रें अपनी ओर कर लीं,
झिझकती, सहमती, बेबस सी
    कोने में बैठी 'मैं' नज़र आयी,
हौले से मैं ने पूछा कि हुआ क्या है...
    इस तरह छुपकर बैठने की वजह क्या है??
सिसकती रही 'मैं' फिर बोली,
    एक तू ही तो है मेरी हमजोली, मेरी संगी, मेरी सहेली...
फेर कर नज़रें तू तो अभिनय कर जाती है
    तेरे अंदर बैठी हुई "मैं"इकली रह जाती है
बात उसकी सौ फीसदी सही है और सीधे दिल पर लगी है
    पर दुनिया की रीत कैसे उसे समझाऊं
अभिनय कर जाना मजबूरी है मेरी, कैसे बतलाऊँ
    कभी अपने लिए 'मैं' को पीछे छोड़ जाती हूँ,
कभी इसके लिए, उसके लिये और सबके लिये....
    ज़ाहिर है मेरी कोई बात न मानेगी 'मैं'
और एक बार फिर आँखों की चिक में ऐसे ही.…...
 सिमट कर रह जायेगी 'मैं'....

Tuesday, 13 November 2018

न पकड़ो, उड़ान भरने दो मुझे
भागते तो होंगे सभी, भागने दो उन्हें
भरनी है उड़ान, उड़ने दो मुझे
कुछ तो अलग होता है सब में,
कुछ तो अलग मुझ में भी है।
करू गर वैसा जैसे करते हैं सब
फिर कैसे पहचानूंगी खुद को मै?
....कौन हूँ मैं?
थोड़ वक्त लम्बा हो गया है...
तो क्या...
वक्त लेना क्या गुनाह हैं??
अब मत पूछो मुझसे कि क्या करना है मुझे,
गुजर गया वक्त जब बताना था मुझे।
करने दो मन का मुझे,
हार भी जाऊंगी तो गम न रहेगा
कम से कम मन का तो करूंगी मैं
याद रखना, गर पैर छीन ले कुदरत
तो भी मन तो उड़ान भरता है।
न कहना मुझसे अब कुछ भी
बस अब उड़ान भरने दो मुझे...
अब उड़ान भरने दो मुझे।

Monday, 26 February 2018

बहुत खुशनसीब हो तुम...
जो थाम कर हाथ किसी का, चल रहे हो.

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अक्सर तनहाइयाँ अच्छी लगती हैं मुझे.….
तब खुद के साथ बैठकर, बातें ढेरों करती हूं मैं.

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बंद कमरे में बैठे हुए वो चाँद के मुंतजिर हैं...
कोई कह दो जरा, हाथ फैलाये बिना तबर्रुख मिलता नहीं.

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ख्वार कर ख़्वाबों को वो ख़्वाहिशें पूछते हैं,
उजाड़ कर खियाबां को ख़ुशबू पूछते हैं,
टूटती ही नहीं ख़ुमारी उनकी,
कि खुर्रम वो अपने ख़ाम में रहते हैं,
ख़ामोश रहकर झिड़क दिया ख्यालों को अपने,
ख़ैर से बस उनकी ख़जालत का ख़ज़ाना माँगते हैं।


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ग़मख़्वार हो हमारे कहते हो तुम, चलो मान लिया,
इश्क़ मेरा कोई तबर्रुख़ तो नही जब चाहा तब माँग लिया।

Tuesday, 17 October 2017

प्यारी किरु

प्यारी  किरु

मिट्टी में लिपट कर, खाकर,
उसकी खुशबु से सराबोर होकर,
आंचल में छुपने को बेचैन है,
आँखें बंद कर अपनी,
इठला रही है, मुस्का रही है,
कभी हंसती, कभी खिलखिलाती है,
अपने रंग में रंगी, मस्ती में डूबी है.
पाजेब की छनछनाहट से अपनी,
सारी धरती को गुंजार रही है,
छोटे-छोटे पाँव को सम्हाल कर रखती हुई,
जीवन जीने का हुनर सीख रही है,
बेखबर है अपनी इन
शैतानियों से, सीखों से,
बस अपनी धुन में लगी हुई,
कुछ गुनगुना रही है, बतिया रही है।