Tuesday, 17 October 2017

प्यारी किरु

प्यारी  किरु

मिट्टी में लिपट कर, खाकर,
उसकी खुशबु से सराबोर होकर,
आंचल में छुपने को बेचैन है,
आँखें बंद कर अपनी,
इठला रही है, मुस्का रही है,
कभी हंसती, कभी खिलखिलाती है,
अपने रंग में रंगी, मस्ती में डूबी है.
पाजेब की छनछनाहट से अपनी,
सारी धरती को गुंजार रही है,
छोटे-छोटे पाँव को सम्हाल कर रखती हुई,
जीवन जीने का हुनर सीख रही है,
बेखबर है अपनी इन
शैतानियों से, सीखों से,
बस अपनी धुन में लगी हुई,
कुछ गुनगुना रही है, बतिया रही है।

Tuesday, 12 September 2017

                                    एक दिन

 एक अलसायी सुबह, जो धीरे-धीरे खत्म हो रही है.....पर मेरे पैर का दर्द अभी बाकी है, बाकी है अभी पूरे घर का काम..., वो किताबें जिन्हें पढ़ने और उनका निचोड़ निकालने का समय मात्र 18 दिन!
बाहर निकलने वाली गाड़ियों की आवाजें, ऊपर आसमान में बारिश का इशारा, मौसम सुहावना है.... फिर भी यहाँ.....घर के अंदर नीरवता पसरी हुई है।
घर  के अंदर नीरवता है!
मन के अंदर तो अंतर्द्वंद की चीख-चिल्लाहट मची हुई है। अंतर्द्वंद भी कैसा??? तुच्छ!!!!
घर के कपडे अभी धुलने चाहिए या नही!!
आज के खाने में क्या बनेगा?? इत्यादि।
 प्रश्न ये है कि क्या पैर का दर्द इतना मायनीखेज है की बाकी सभी कुछ रोक दिया जाये???
बिल्कुल सटीक तो नहीं बता सकती, परंतु नहीँ!!!!
फिर क्या है उठाओ झाड़ू और फेर दो सारे घर में, फिर उठाओ परात और गूँथ डालो आटे को, भर दो कटोरदान रोटियों से और चला दो चमचा पतीले में, बजने दो सीटी कुकर की और भंग कर दो नीरवता इस घर की, धनिये पत्ती संग हरी मिर्ची की मिर्चाहट को स्वादिष्ट चटनी में बदल दो.......
माना कि उलझन भरा रविवार है और उलझने थोड़ी ज्यादा हैं.... छोड़ो इन उलझनों को! समेट कर इन्हें चटाई बना लो, फिर इस पर थोड़ा सुस्ता भी लेना।
लो फिर मैं खड़ी हो गयी....घर के कामों को उनके अंजाम तक पहुँचाने में.......
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.....ये आखिरी रोटी भी तवे पर पहुंच गयी, दही, चटनी,सब्जी, दाल सभी कुछ तैयार हो गया।

अब आराम से बैठ जाती हूँ चटाई पर।
आह्ह....मेरा पैर!!
इस दर्द के साथ उभर गया अंतर्द्वंद.........तुच्छ!!
अंतर्द्वंद,.......और  सुबह से लेकर अब तक का सारा द्वन्द मेरी आँखों में घूम गया....और घूम गया वो प्रश्न!
वही प्रश्न.....जिसका जवाब था "ना"
(मेरा सारा काम निबट चुका था।)