Tuesday, 13 November 2018

न पकड़ो, उड़ान भरने दो मुझे
भागते तो होंगे सभी, भागने दो उन्हें
भरनी है उड़ान, उड़ने दो मुझे
कुछ तो अलग होता है सब में,
कुछ तो अलग मुझ में भी है।
करू गर वैसा जैसे करते हैं सब
फिर कैसे पहचानूंगी खुद को मै?
....कौन हूँ मैं?
थोड़ वक्त लम्बा हो गया है...
तो क्या...
वक्त लेना क्या गुनाह हैं??
अब मत पूछो मुझसे कि क्या करना है मुझे,
गुजर गया वक्त जब बताना था मुझे।
करने दो मन का मुझे,
हार भी जाऊंगी तो गम न रहेगा
कम से कम मन का तो करूंगी मैं
याद रखना, गर पैर छीन ले कुदरत
तो भी मन तो उड़ान भरता है।
न कहना मुझसे अब कुछ भी
बस अब उड़ान भरने दो मुझे...
अब उड़ान भरने दो मुझे।

Monday, 26 February 2018

बहुत खुशनसीब हो तुम...
जो थाम कर हाथ किसी का, चल रहे हो.

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अक्सर तनहाइयाँ अच्छी लगती हैं मुझे.….
तब खुद के साथ बैठकर, बातें ढेरों करती हूं मैं.

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बंद कमरे में बैठे हुए वो चाँद के मुंतजिर हैं...
कोई कह दो जरा, हाथ फैलाये बिना तबर्रुख मिलता नहीं.

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ख्वार कर ख़्वाबों को वो ख़्वाहिशें पूछते हैं,
उजाड़ कर खियाबां को ख़ुशबू पूछते हैं,
टूटती ही नहीं ख़ुमारी उनकी,
कि खुर्रम वो अपने ख़ाम में रहते हैं,
ख़ामोश रहकर झिड़क दिया ख्यालों को अपने,
ख़ैर से बस उनकी ख़जालत का ख़ज़ाना माँगते हैं।


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ग़मख़्वार हो हमारे कहते हो तुम, चलो मान लिया,
इश्क़ मेरा कोई तबर्रुख़ तो नही जब चाहा तब माँग लिया।