मैं
एक दिन मैंने अपनी दिशा बदल ली,
मेरी नज़रें अपनी ओर कर लीं,
झिझकती, सहमती, बेबस सी
कोने में बैठी 'मैं' नज़र आयी,
हौले से मैं ने पूछा कि हुआ क्या है...
इस तरह छुपकर बैठने की वजह क्या है??
सिसकती रही 'मैं' फिर बोली,
एक तू ही तो है मेरी हमजोली, मेरी संगी, मेरी सहेली...
फेर कर नज़रें तू तो अभिनय कर जाती है
तेरे अंदर बैठी हुई "मैं"इकली रह जाती है
बात उसकी सौ फीसदी सही है और सीधे दिल पर लगी है
पर दुनिया की रीत कैसे उसे समझाऊं
अभिनय कर जाना मजबूरी है मेरी, कैसे बतलाऊँ
कभी अपने लिए 'मैं' को पीछे छोड़ जाती हूँ,
कभी इसके लिए, उसके लिये और सबके लिये....
ज़ाहिर है मेरी कोई बात न मानेगी 'मैं'
और एक बार फिर आँखों की चिक में ऐसे ही.…...
सिमट कर रह जायेगी 'मैं'....
एक दिन मैंने अपनी दिशा बदल ली,
मेरी नज़रें अपनी ओर कर लीं,
झिझकती, सहमती, बेबस सी
कोने में बैठी 'मैं' नज़र आयी,
हौले से मैं ने पूछा कि हुआ क्या है...
इस तरह छुपकर बैठने की वजह क्या है??
सिसकती रही 'मैं' फिर बोली,
एक तू ही तो है मेरी हमजोली, मेरी संगी, मेरी सहेली...
फेर कर नज़रें तू तो अभिनय कर जाती है
तेरे अंदर बैठी हुई "मैं"इकली रह जाती है
बात उसकी सौ फीसदी सही है और सीधे दिल पर लगी है
पर दुनिया की रीत कैसे उसे समझाऊं
अभिनय कर जाना मजबूरी है मेरी, कैसे बतलाऊँ
कभी अपने लिए 'मैं' को पीछे छोड़ जाती हूँ,
कभी इसके लिए, उसके लिये और सबके लिये....
ज़ाहिर है मेरी कोई बात न मानेगी 'मैं'
और एक बार फिर आँखों की चिक में ऐसे ही.…...
सिमट कर रह जायेगी 'मैं'....