Friday, 28 November 2014

दूसरा आसमान !

   यह शीर्षक किसी गूढ़ साहित्य को समेटे हुए नही है....................यह तो हमारे नन्हू -मुन्नू गुड्डू के मुख से निकले शब्द हैं। जो किसी भी विचारक के लिए बहुत कुछ अर्थ समेटे हो सकता है।
   श्रावण मास का अंतिम सोमवार , अपने अंदर पूजा-अर्चना के ढेर सारे कार्यक्रम व क्रियाकलाप समेटे हुए। 
   अंतिम सोमवार है तो सभी इस दिन भगवान शिव को अपनी सामर्थ्यानुसार भोग लगाते हैं.……………कहीं भंडारा , तो कहीं कीर्तन। हमारे यहाँ भी प्रसाद बना और भगवान का भोग लगने मंदिर भी गया। अब चूँकि हमारे यहाँ प्रसाद बना है और हमारे शोना को न मिले… ऐसा तो हो ही नही सकता………………………उसका तो अनियोजित अंश रहता है हमारे यहाँ होने वाले प्रत्येक आयोजन मे।
   हमेशा की तरह आज भी वो उपस्थित था। बरसात का मौसम होने के कारण वो और मैं कमरे के अंदर बैट-बॉल खेल रहे थे कि वो थक गया, अप्रत्याशित!!! ……………अक्सर तो खेल में हम ही थक जाते थे, उसका थक जाना आश्चर्य ही था।
  फिर हम दोनों बैठकर उसके स्कूल की बातें ,कुछ मेरे घर - कुछ उसके घर की बातें , कुछ इधर की - कुछ उधर की बातें करने लगे।
   तभी बातें करते -करते वो खिड़की की तरफ इशारा करके बोला -" वो क्या है?"
मैंने कहा-"खिड़की"
-"नहीं वो..............वो क्या है? उसको क्या कहते हैं?"
मैंने कहा -"गिरिल "
-"नई वो , वो………… वो सामने?"
मैंने कहा -" दीवार "
-"नई................... वो जो है ना वो। "
"बाबू तू क्या पूछ रहा है? ", "मुझे समझ नही आ रहा……………"
-"दीदी मैं वो पूछ रहा हूँ ", फिर बाहर की तरफ इशारा करते हुए।
मैं झल्लाकर , " आसमान?"
बहुत ख़ुशी से , "हाँ………, मेरे पापा भी कहते हैं। "
मैं थोड़े धैर्य के साथ ," क्या कहते हैं ?"
-"आसमान !! मेरे घर में भी है,  दूसरा आसमान !!! "
मैं मुस्कुरा कर बोली, "नही , गुड्डू आसमान तो एक ही होता है। "
-"दीदी ! मेरे घर के आसमान में बिजली भी जलती है , वो दूषरा आसमान है। "
 
    ओह ! मुझे उसपर अथाह प्यार आया , उसकी तुतलाती भाषा में यह सब सुनना  कितना रसपूर्ण है!
   मैंने उसे गोद में उठा लिया प्यार से , तो महसूस किया कि वो गरम हो रहा है, उसे बुखार है।  इसी कारण  आज बैट -बॉल ज्यादा देर तक खेलने की जिद नहीं की , और मुझे उसके मुख दे इतनी सुन्दर बात सुनने को मिली।
   ऐसा प्रतीत हुआ , मेरे द्वारा की गयी पूजा फल आज के आज ही मिल गया हो.…………………। 
       














Thursday, 27 November 2014

नन्हे बच्चे !

कितने चंचल और शरारती हैं ये बच्चे ,नालायक हैं एकदम।  गर्मियों की छुट्टियां और इनकी उच्चश्रंखलता................ऊपर वाला बचाये। 
जैसे ही देखा किसी को आते हुए भागना शुरू कर देते हैं, बिना किसी लक्ष्य के।
 क्या कोई नुक-सुक  लड़की , क्या कोई मूंछो पर ताव देने वाला, क्या कोई लाठी लिए इंसान……………… किसी को नही छोड़ते। सब बचना चाहते हैं इनसे। 
विभिन्न रंगों से सराबोर इनकी अपनी अलग दुनिया है, अपनी एक अलग भाषा ( हमारी सामान्य भाषा से अलग, शायद किसी से साझा नही करना चाहते। )
इनसे आप इनकी मम्मियों के बारे में पूछें जरा, मजाल जो एक शब्द भी अपने मुँह से निकाले …………………टुकुर -टुकुर देखते अवश्य रहेंगे।
कार्यदिवस में कम से कम घर में रहना होता है, सुबह उठो दैनिक कार्य निपटाओ और ऑफिस के लिए निकल जाओ , शाम को थकहारे लौट कर आओ तो तो खाना बनाओ -खाओ -सो जाओ।
इतने कम समय में इतने सारे काम और सोना भी होता है  …………… इन बच्चों से उलझने का समय ही नहीं होता , और यदि ये कोशिश करें तो साफ़ बचकर निकलने में ही भलाई है……………।  परन्तु इस सबसे इतर कभी-कभी ये बहुत आफत कर देते हैं…………………आपको प्रातः वाशरूम प्रयोग करना रहता है, और ये कब पहले ही जागकर आपसे पूर्व ही वहाँ प्रकट हैं  ये आपको मालूम ही नही होगा............. अब कीजिये प्रतीक्षा इनके बाहर  आने कि……………निःसंदेह  कुछ दिलेर भी हैं जो निपट लेते हैं इनसे।
अब आप निवृत्त होकर रसोई घर का रुख करना चाहेंगे , तो ये बच्चे वहाँ भी किसी कोने में छुपे मिलेंगे।
क्या कोई मोर-पंख और क्या कोई अंडे के छिलके इनके के मन में डर की लहर पैदा कर सके , इक्कीसवीं सदी की पैदाइश हैं ये !!!..................... 
सार यह है कि कोई भी उपाय कीजिये, इनसे छुटकारा नही मिल सकता।
   वैसे मैंने एक अलग बात नोटिस की है इनमें………………कि  ये देखने में, शारीरिक बनावट में बड़े ही भिन्न हैं। इनकी दोनों आँखों के पीछे एक-एक छिद्र है जिसमे से आप आर-पार देख सकते हैं....................... सम्भवतः ये इनकी श्रवणेन्द्री  हों। ……………जी हाँ श्रवणेन्द्री !!!
यकीन न आये तो किसी परिपक्व में आसानी से देख सकते हैं आप................. तो ढूंढिए जरा किसी छिपकली को।