Tuesday, 17 October 2017

प्यारी किरु

प्यारी  किरु

मिट्टी में लिपट कर, खाकर,
उसकी खुशबु से सराबोर होकर,
आंचल में छुपने को बेचैन है,
आँखें बंद कर अपनी,
इठला रही है, मुस्का रही है,
कभी हंसती, कभी खिलखिलाती है,
अपने रंग में रंगी, मस्ती में डूबी है.
पाजेब की छनछनाहट से अपनी,
सारी धरती को गुंजार रही है,
छोटे-छोटे पाँव को सम्हाल कर रखती हुई,
जीवन जीने का हुनर सीख रही है,
बेखबर है अपनी इन
शैतानियों से, सीखों से,
बस अपनी धुन में लगी हुई,
कुछ गुनगुना रही है, बतिया रही है।

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