Wednesday, 2 April 2014

स्पर्धा



गैस पर पैन रखकर  चाय बनने  के लिए रख दी , गैस धीमी कर के बाकी सारे घर में झाड़ू लगाने लगी।  थोडा-थोडा आलस अभी शरीर में समाया था , झाड़ू किनारे रखकर चाय छलनी से छानकर कर कपों में डाल दी। पापा मम्मी को चाय देकर कप मुँह से लगाया तो चाय अभी गरम थी। सोचा इतने मे बर्तन साफ़ कर लेती हूँ , बर्तन के लिए एक महरी रखी थी। पर वो जब तब छुट्टी  लेकर, कभी बिना कहे गोल कर जाती थी।  रोजाना आती तो अच्छा था। परस्पर एक दूसरे के काम आते।  ख़ैर आधे बर्तन तो साफ़ हो चुके , बाकी भी हो जायेंगे...................अरे!  चाय .... चलो अब जल्दी से एक घूँट में ही गटक ली जायेगी।
दाल बन गयी रात कि सब्जी रखी है, सर्दी का यही तो फायदा है , रोटी बी बस अभी दाल देती हूँ। पहले जरा दूध गरम कर दूँ, फिर पापा को एक बार और चाय चाहिए। सवा आठ तक ये सब काम हो जायेंगे, साढ़े आठ बजे तक रोटियाँ  सेक दूंगी, फिर ऊपर कमरे के बिस्तर  समेटने  के बाद अच्छे से तैयार होने का समय मिल जायेगा , सुकून से खाना खाकर टाइम से कॉलिज के लिए निकल जाऊँगी। 9 :30 बजे ऑटो स्टैंड पर पहुँच जाऊं तो समय से कालिज में पहुँच जाती हूँ

  आजकल कॉलिज  में भी सख्ती होने लगी है। अरे ये क्या आठ बजकर पैंतीस मिनट हो गए ..................पापा बस अभी लगाती हूँ आपके लिए थाली।  शोना  बाबू  ये नमक कि डिब्बी तो देकर आना , मेरा शोना बहुत  काम करता है।  तुजे भी बाबा के साथ ही खाना है , आजा मेरे पास ,'' दीदी ने तेरे लिए आलू का परांठा बनाया है"

   (शोना हमारे पड़ोसी का दो-ढाई बरस का बेटा है, प्यारा सा है, अकसर हमारे ही पास रहता है।  देखा-देखी  मम्मी को मम्मी ही कहता है और पापा को बाबा कहता है................ खिलौना है हमारा। )

अरे  कितना वक़्त हो गया.............. मैं धीरे-धीरे चल रही हूँ  ये घड़ी है कि दौड़ लगा रही है………… इसे आज पीछे छोड़ ही दूंगी……
7 :45  तक तो  ये भी सुस्ती में रहती है फिर न जाने कहाँ से जोश आ जाता है बिना चाय पिए ही कि लगती है दौड़ लगाने, फिर कितना भी जोर लगा लो अक्सर पीछे ही छोड़ देती है। 9  बजे तो लगता है की 1 मिनट का चक्कर 30 सेकिण्ड में ही पूरा कर रही है नालायक़ !

"गुड्डा देख बाबा जा रहे हैं।" " चलो बाय  कर दो"।
  "तूने परांठा नही खाया , मैंने इतना टेस्टी परांठा बनाया है।"
 "मम्मी इसे अपने पास बुला लीजिये ये परेशान कर रहा है।" 
"मम्मी बाकी काम आकर कर दूंगी ....................."
"मम्मी निचे आ जाईये , मैं बस निकलने वाली हूँ।" 
_" बेटी तूने कुछ खा लिया , तू काम छोड़ देती मैं  धीरे -धीरे  कर लेती , शोना आजा नीचे  चलते हैं दीदी को देर हो रही है तू दरवाजा बंद कर लेना। "
  ( आजकल मम्मी की तबियत ठीक नही है वरना अपने तो मजे ही मजे हैं.……) 
-"दीदी  आपने खाना खा लिया ,मुजको नहीं खिलाया ……। ( वो नाराज हो रहा था , उसके  हाथ में खाली प्लेट देख कर.……… जल्दी कि वजह से उसने रोज़ाना की तरह उसे अपने साथ नही खिलाया था )
तभी अचानक घड़ी की तरफ नज़र.............हाथ धो कर.…… मम्मी मैं जा रही हूँ।
बाय गुड्डू ! दरवाजा बंद कर लो.…………
दीदी गोल मिठाई लाना , o.k. गुद नाईत  , सी यू , टुमोरो।
  (कोल मिठाई- लॉलीपॉप ,  केरल कि भाषा मैं यही कहते हैं , और वो उसे बिगाड़कर कर गोल मिठाई कहता है। )
घर से निकलते हुए मैंने घडी पर नज़र डाली तो घड़ी 9 :40 बजा रही थी................
मुझे गुस्सा आ रहा था और वो फिर जीत गयी थी एक और स्पर्धा। 

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